रविवार, 15 अक्तूबर 2017

भाग-23 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

भाग-23 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर.....
                                                       संकट का "स".....!

                            नयन सरोवर पर करीब आधा घंटा रुकने के उपरांत मैं,  विशाल रतन जी व पथप्रदर्शक केवल पुनः श्री खंड शिला की ओर अग्रसर होते हुए "गई पर्वत " पर चढ़ाई करने लगे,  बेहद सीधी चढ़ाई और रास्ते के नाम पर एक पत्थर से उछल दूसरे पत्थर पर चढ़ो-उतरो.......बस ऊपर दिख रहे अन्य पदयात्रियों की दिशा ही हमारे रास्ते की दिशा को तय कर रही थी,  मैने ऐसी स्थिति को अपनी "होली-मनीमहेश यात्रा" के दौरान "सुखड़ली" के बाद आई "कलाह पर्वत" की चढ़ाई से मेल कर विशाल जी को याद करवा कर बोला कि देखो कलाह पर्वत सी चढ़ाई है ना,  तो विशाल जी बोले, " हां,  परन्तु वहाँ तो एक कलाह पर्वत की कठिन चढ़ाई थी, यहाँ तो चार कलाह पर्वतों के जैसी चढ़ाई आगे नज़र आ रही है विकास जी...! "      और मैं जोश से बोला, " बम बोल... कोई चिंता नही...!! "
               परन्तु दोस्तों "चिंता" तो ऊपर बैठी एक निश्चित जगह पर हमारा इंतजार कर रही थी.... बस उस चिंता की ओर हम कदम-दर-कदम बढ़ते जा रहे थे... विशाल जी की रफ्तार बेहद कम हो चली थी, सो पथप्रदर्शक केवल उनकी निरंतर सहायता करता जा रहा था..... मेरा हाल वही पुराना,  कभी ऊपर की फोटो खींचूँ तो कभी पीछे मुड़ कर कैमरे के बटन दबाता.... ऐसा करने पर मुझे यात्रा के दौरान साँस लेने का अवसर खुद व खुद ही मिल जाता है जबकि विशाल जी मस्त हो निरंतर चले रहते हैं।
                पौने घंटे चढ़ते रहने पर गई पर्वत के मध्य में पहुँच कर वहाँ से नयन सरोवर का जो दृश्य नज़र आ रहा था,  वह बेहद दिलकश था और वहीं से ही हमे दूर भीरद्वारी के भी दर्शन होने लगे,  जहाँ से हम सुबह 3बजे के चले हुए थे... तभी नीचे पार्वती बाग की ओर से कुछ लड़कों का दल चढ़ता हुआ नयन सरोवर की ओर आता दिखा,  जिन की मस्ती  भरी चीखों से पूरी घाटी गूंज रही थी.....मैं विशाल जी से बोला, " लो आ गए गढ़शंकरियें... ये लोग निश्चित पम्मा और उसके साथी है, जो हमे कल रास्ते में मिले थे... विशाल जी हम पंजाबियों की यह ही पहचान है कि हम लोग जब बेहद खुश होते हैं, तो चीखें व हुंकारें हमारे मुख से खुद व खुद ही निकलती है,  किसी विशेष स्थान या मौके पर पहुँच कर हम पंजाबी अपनी चंचलता को काबू में नही रख पाते,  जैसे मैने तमिलनाडु यात्रा के दौरान ऐलौरा की गुफाओं में देखा था कि एक तरफ तो देश-विदेश से आए सैलानी विश्वप्रसिद्ध गुफा मंदिरों के साथ अपनी फोटो खिंचवा रहे थे और दूसरी तरफ दो पंजाबी नौजवान एक पेड़ पर चढ़ कर उससे लटक-लटक कर अपनी फोटो खिंचवाने में मस्त-व्यस्त थे...!!! "
                मेरी बात फिर से विशाल जी को हंसने के लिए मजबूर कर गई... और नयन सरोवर पर भी मेरे गढ़शंकरिये पंजाबी भाइयों ने ठीक वैसे ही अपनी चंचलता का परिचय दिया, सारे-के-सारे जमी हुई नयन सरोवर पर चढ़ कर मस्ती में शिव के जयकारें और चीखों की मिश्रित बोली बोलने लगे।
                  नयन सरोवर के करीब एक घंटे चलते रहने के बाद जैसे ही गई पर्वत के शिखर पर पैर रखा, दूसरी तरफ नज़ारा अलौकिक ही था दोस्तों,  महान हिमालय की हिमाच्छादित चोटियाें की लम्बी कतार देख कर जैसे मेरा सम्पूर्ण शरीर ही एक जगह पत्थर बन जम गया हो... मैं पलकें झपकाना ही भूल गया,  क्योंकि वह नज़ारा जीवन में पहली बार देखा था....और पीछे एक चिरपरिचित शब्द कानों में आ गूँजा, "ओसम्" ...............विशाल जी भी हक्के-बक्के से खड़े पर्वत के दूसरी ओर दिख रही नई सुंदरता को अपनी आँखों में समेट रहे थे और आखिर उनका कैमरा भी कुछ समय के लिए सांसें लेने लगा,  जबकि मेरे कैमरे को तो उल्टा आक्सीजन देनी पड़ती है दोस्तों।
                  करीब आधा घंटा तो हम दोनों प्रकृति प्रेमी उस अनुपम दृश्यावली की महिमा गाते रहे क्योंकि पर्वत में सबसे खूबसूरत भाग उसका शिखर ही होता है, पर यहाँ तो हमें महान हिमालय के कई सारे शिखर एक साथ दिख रहे थे।
                  सो,  अब गई पर्वत से "बसार गई पर्वत " की चढ़ाई की ओर रूख किया,  तो हमारे पास से ऊपर से नीचे उतर रहे तीन लड़के जिनमें एक के पास "गिटार" थी, को मैने कहा कि क्यों भाई...भोले बाबा को सुना आए गिटार की धुन,  तो वह लड़का बोला, " कहाँ जी,  ऊपर तो बहुत ज्यादा ठंड है, गिटार बजाने की कोशिश भी की परन्तु हाथ सुन्न हो गए...! "
और तभी एक व्यक्ति और ऊपर से उतरा जिसकी फौजी सी पोशाक देख मैं बोला, "फौजी साहिब दर्शन हो गए, तो वे बोले, " हाँ, पर मैं फौजी नही हूँ "          मैं झट से बोला, " तो फिर क्या हुआ, चलो हम सब मिल कर भारत माता की जय का उद्घोष लगाते है "     और एक दम से मैने आस-पास सब में जोश भर दिया।
                   वहीं रास्ते में विश्राम हेतू बैठे कुछ नवयुवकों के दल ने मुझ से पूछा कि हम कितनी ऊँचाई पर पहुँच चुके हैं,  मैने अपनी घड़ी देख इतराते हुए  कहा, "4395मीटर....और आप में से जो भी लोग पहली बार इतनी ऊँचाई पर पहुँचें है, यह अपने-आप में ही किसी उपलब्धि से कम नही है। "                  वे सब एक सुर में बोले, " हम सभी पहली दफा जा रहे हैं श्री खंड...!"
                     बसार गई पर्वत पर चढ़ते हुए अभी केवल पांच मिनट ही हुए थे कि एकाएक मौसम में तबदीली आनी प्रारंभ हो गई..... नील गगन अपनी नीलिमा खोता सा नज़र आना आरंभ हो गया,  मानों अकस्मात ही मेघों की सेना ने अम्बर को घेर लिया हो.... और झट से अपना प्रहार भूमि पर कर दिया,  हम दोनों ने तीव्रता से अपने जलरोधी वस्त्र "पोंचूँ" धारण कर लिये व गाइड केवल ने अपनी छतरी तान ली...... पर यह क्या बारिश के साथ अब बर्फ भी गिरने लगी,  खैर हौसले से मैं सबसे आगे चढ़ता रहा......
                       अब ताज़ा बनी प्रतिकूल परिस्थिति में मुझ नास्तिक में जाने फिर से "भाव" जाग उठा कि देख विकास,  भोले बाबा ने तेरा क्या खूब स्वागत किया,  तुझे इस यात्रा में हर रंग दिखा दिया... ले अब बर्फबारी का अनुभव भी ग्रहण कर...!! "
                        और,  मैं वही अपना मनपसंद पहाड़ी भजन, " शिव कैलाशों के वासी, धौली धारों के राजा, शंकर संकट हरना.......! "          "संकट" शब्द का केवल "स " ही बोल पाया कि भावुकता ने नेत्रों से नीर बहा दिया और शब्द कंठ में ही दब गये...... वह चंद क्षण अलौकिक चुप्पी के बहुत भारी व लम्बे लग रहे थे,  कि अपनी मनोदशा को पीछे आ रहे विशाल जी तथा केवल से छुपातें हुए जोर-जोर से बम-बम भोले के जयकारे लगाने लगा,  पर अपनी चलने की गति को कम नही होने दिया...... परन्तु विशाल जी को चलने में दिक्कत थी क्योंकि उनका पोंचूँ चढ़ाई चढ़ते समय उनके पैरों में बार-बार फंसता जा रहा था,  तो मैने उनके पोंचूँ को ऊपर कर गांठें बांध दी।
                         मौसम अब हर पल अपना जोर बढ़ाता सा जा रहा था,  सफेद शरीफ बादलों का रंग बदमाशी पर आ काला होने लगा था,  रही- सही कसर अब हवा ने चल कर निकाल दी थी...उस अत्यन्त सर्द हवा के प्रहार हमारे शरीर को तोड़ रहे थे,  परन्तु मैं रुक नही रहा था...कदम-दर-कदम ऊपर की ओर बढ़ाता जा रहा था,  और निरंतर अपनी घड़ी पर तापमान भी देखता जा रहा था,  मौसम बिगड़ने से पहले गई पर्वत पर तापमान 8डिग्री था जो अब पिछले दस मिनट में  लगातार घट कर 4डिग्री के करीब आ चुका था............ !

                                                       ................................(क्रमश:)
नयन सरोवर से ऊपर की ओर गई पर्वत पर चढ़ाई.... 

गई पर्वत पर चढ़ाई करते हम "कीड़े-मकोड़े" से इंसान.... 

गई पर्वत से नीचे दिखाई देती पार्वती बाग घाटी और इनमें मेरे गढ़शंकिरयें पंजाबी भाइयों की मस्ती भरी चीखें गूँज रही थी...  

ऊँचाई से क्या खूबसूरत नज़र आ रहा था "नयन सरोवर "

गई पर्वत पर चढ़ते हुए हम दोनों साढूं भाई... 

विशाल जी की सहायता को तत्पर पथप्रदर्शक केवल... 

जमी हुये नयन सरोवर पर पहुँच मेरे गढ़शंकिरये पंजाबियों की चंचलता चरम पर पहुँच चुकी थी और उनके द्वारा लगाये जा रहे शिव के जयकारों व चीखों की मिश्रित आवाजें चारों दिशाओं में पहुँच रही थी...

गई पर्वत की एक निश्चित ऊँचाई पर पहुँच, अब नीचे भीमद्वारी भी दिखाई देना लग पड़ा था... 

भीमद्वारी का दृश्य.... कैमरे की बड़ी आँख से 

लो, भाई मेरी फोटो इस बर्फ के साथ भी खींच लो... 

गई पर्वत से दिख रहा "बसार गई पर्वत "

विश्राम के पल... 

गई पर्वत को पार करने से कुछ पहले का चित्र... 

और, गई पर्वत के सिर पर पहुँच कर पहली नज़र से उस पार का नज़ारा.... 

बहुत सुंदर,  मैं तो अपनी पलकें झपकाना भी भूल गया... 

और, विशाल जी अपना चिरपरिचित शब्द "ओसम्" बोले बिना नही रह सके... क्योंकि अब हमारी आँखों के समक्ष महान हिमालय की बहुत सारी हिमाच्छादित चोटियाँ जो थी... 

लो, भाई मेरा कैमरा... और खींच डाल मुझे भी... 

यहाँ पहुँच,  विशाल जी का कैमरा भी संजीव हो गया... 

अरे भईया,  फोटो सैशन भी बनता है ना... 

बसार गई पर्वत की चढाई.... यदि आप इस चित्र को बड़ा कर देखे तो, आप को पर्वत के शिखर पर यात्री नज़र आएेंगें... 

क्यों....प्यारे, सुना आये भोले बाबा को गिटार की धुन... 

कोई बात नही,  चलो हम सब मिल कर "भारत माता की जय " बोलते हैं... 

और, खुशगवार मौसम को शायद मेरी ही नज़र लग गई.... 

बारिश, बर्फबारी और सर्द तेज हवा....!!!



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रविवार, 24 सितंबर 2017

भाग-22 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर....Shrikhand Mahadev yatra(5227mt)

 भाग-22 श्री खंड महादेव कैलाश की ओर.....
                               " यात्रा के अनुभवों में तड़का,  चट्टान का गिरना...!"

                                    22जुलाई 2016 ......सुबह सवा पाँच बजे ही एक दम से उजाला हो गया और मौसम भी साफ था,  मैं और विशाल रतन जी भीमद्वारी से अपने पथप्रदर्शक "केवल" के अंग-संग पार्वती बाग से नयन सरोवर की ओर चढ़ रहे थे.... हमारे आगे-पीछे हर कोई अपनी लय में मगन चल रहा था,  जितनी जिस की आस्था उतना ही वो मगन चल रहा था जैसे एक नवयुवक नंगे पैर चढ़ रहा था.......मेरी निगाहें तो हमेशा ही पर्वतों के इर्दगिर्द ही घूमती रहती है,  सो कभी पीछे मुड़ दिख रही पर्वतों की परतों को देख लेता, क्योंकि मुझे इंतजार था उन पर पड़ने वाली सूर्योदय की स्वर्णिम किरणों का.... ठीक आधे घंटे बाद वो सोने सी पहली किरण भी दिखाई दे गई पर्वत शिखर पर...
                  रास्ते में भाँति-भाँति के हसीन पुष्प मुझे देखकर ऐसे इतरा रहे थे कि जैसे उन्हें पता हो कि वे बहुत हसीन है,  रास्ते के एक पत्थर पर बैठ हम कुछ साँस लेने रुक गए,  तो एक नवविवाहित पहाड़ी जोड़ा ऊपर को चढ़ता हुआ हमारे पास से गुज़रा....मैं नवविवाहिता के गले में सोने का हार देख, हैरान हो उन दम्पति से बोला यदि आप ऐसे ही इस सोने के हार को गले में लटका,  इन पहाडों से उतर हमारे मैदानों में आ जाओ...तो निश्चित है कि आप के गले से यह हार चोर-लुटेरों द्वारा लूट लिया जाएगा....!         मेरे मुख से ऐसी बात सुन भोली-भाली नवविवाहिता ने जल्दी से अपना हार कपड़ों के अंदर कर लिया..... दोस्तों,  उस नवविवाहिता के गले में जेवर का अर्थ है कि हिमाचल के पहाडों में हमारे मैदानों की लुटेरी हवा नही पहुँच पाई है,  मेरे सोहने पंजाब में तो जब से नशाखोरी बढ़ गई है.. हम सब के गहने बैंकों के लॉकरों में पड़े सड़ रहे हैं....!!
                    इस बात से सम्बन्धित एक और अनुभव आप संग बांटता हूँ कि दो साल पहले मैं सपरिवार तमिलनाडु यात्रा के दौरान मदुरई में आकाश मार्ग से उतरा,  अगले दिन मदुरई घूम कर बस में बैठ रामेश्वरम् के लिए चल दिया... तो मेरी आगे वाली सीट पर एक व्यक्ति 6मास के शिशु को उछाल-उछाल कर हंसा रहा था,  उस छोटे से शिशु के गले में सोने की चेन देखकर अपनी पत्नी से बोला, "देखो कैसे बेवकूफ़ लोग हैं इतने छोटे से बच्चे के गले में सोने की कीमती चेन... इस चेन की वजह से ही कोई इस बच्चे को उठा कर ना ले जाए...!! "      
                    तभी मेरी श्रीमती जी ने कहा जरा उस व्यक्ति की अंगुलियाँ भी तो देखो जो इस बच्चे को थाम रही थी,  देखा तो उन अंगुलियों में तीन सोने की अंगुठियाँ सज रही थी.... ऐन वक्त पर परिचालक टिकट काटने आया तो,  उसके हाथ में एक सोने की अंगूठी और कलाई में सोने का बाजूबंद था... फिर नज़र झट से घुमाई बस चालक की ओर तो चालक के सिर के सामने लगे पीछे देखने वाले शीशे में उसके गले में पड़ी सोने की जंजीर की चमक थी... मैने झट से सारी बस ही देख मारी,  सब के पास कुछ ना कुछ सोने का आभूषण था... सच में मुझे ऐसे प्रतीत हुआ जैसे मैं सतयुग में आ गया हूँ और श्रीमती जी से हंस कर बोला, " यदि मुझे पहले पता होता कि यहाँ ऐसा माहौल है,  तो हम भी अपने ज़ेवर बैंक से उठा कर यहीं ले आते... चार दिन पहनतें तो सही, यदि पंजाब में इन्हें पहन कर चलूँ तो हर कोई घूरता है...!!! "          और मेरी पत्नी भी हंस दी मेरी इन मूर्ख सी बातों पर।
                      वह नवविवाहित दम्पति जोड़ा आगे बढ़ गया और हम उनके पीछे-पीछे......कि एकाएक बहुत तीव्र ध्वनि में गर्जना हुई जैसे बादल गरज रहे हो,  मैने आसमान की ओर सिर उठाया तो कहीं भी गरजतें मेघ नही दिखाई पड़े.... और दूसरे क्षण एक आवाज़ सुनाई दी, "भागों, ऊपर से एक चट्टान गिर रही है "      आनन-फानन में ऊपर देखा तो एक बहुत बड़ी चट्टान धूल के गुब्बार में से पर्वत की ऊँचाई की ओर से दडादड आवाज़ करती हुई हमारी ओर गिरती चली आ रही है,  कहाँ तो इतनी ऊँचाई पर एक-एक कदम कछुए सी चाल के माफिक रख चल रहे थे और कहाँ डर की एक सिहरन उस कछुए से बने हमारे शरीर में दौड़ कर हमे चीता बना गई..... सब ने ऐसी रफ्तार पकडी कि जैसे खो-खो खेल रहे हो,  सुरक्षित जगह पर पहुँच.. गिर रही उस चट्टान की मैं वीडियो बनाने लगा, चट्टान गुज़रने के बाद देखा कि हड़बराहट में मैं कैमरे का रिकार्डिंग बटन ही दबाना भूल गया..... विशाल जी मुझ से बोले, " लो विकास जी, इस गिरती चट्टान ने हमारी श्री खंड यात्रा के अनुभवों में तड़का लगा दिया...! "  मैं बोला, " हां जी,  ये गिरती चट्टान देखने का भीषण मंजर भी हमनें जीवन में पहली बार ही देखा है,  जबरदस्त.... यदि कोई इस गिरती हुई चट्टान के रास्ते में आ जाए,  सोच कर ही शरीर में झुनझुनी सी हो रही है...! "             और,  हम सब ने चुप्पी तोड़ी शिव के एक जयकारे से.....सबसे पीछे चल रहे एक लड़के को जिसके बहुत पास से वो चट्टान गुज़री,  एक हल्का सा पत्थर आ लगा,  पल भर पहले चित्कार रहा पर्वत.. पल भर बाद ही ऐसा खामोश हो गया जैसे उसे आराम आ गया हो।
                        आधे घंटे की चढ़ाई के बाद एक मोड़ मुड़ देखा कि कुछ दूर कई सारे लोग जमा थे... वह नयन सरोवर या नैनसर झील थी और हमारे चेहरे भी उस जमी हुई सुंदर झील को देख खिल गए,  क्योंकि मैं अपनी स्वप्न यात्रा में साक्षात जो पहुँच रहा था.... हमारी खुशी देख केवल बोला,  "इस बार तो बर्फ ही बहुत कम है,  पार्वती बाग से नयन सरोवर के मध्य दो-तीन ग्लेशियर आते हैं....जो इस बार बहुत पहले ही पिघल गए, मैने हंसते हुए केवल से कहा, " जो भी मेरे ये नयन देख रहे हैं, मन के मयूर को उकसा रहे है कि तू नाच रे विकास...! "
                         गई पर्वत और जगत पर्वत के बीच में बने नयन सरोवर(4255मीटर) पर हम सुबह पौने सात बजे पहुँच गए और उस समय वहाँ का तामपान 7डिग्री था,  तीन तरफ से पर्वतों में घिरी नयन या आँख के आकार की यह शांत झील,  प्रचण्ड प्रवाह में बह रही कुपरन नदी का उद्गम स्थल है जो हमे पदयात्रा के शुरुआत में मिली थी.... इस झील के जल को गंगा जल के समान ही पवित्र माना जाता है,  पुरातन रीति-रिवाज़ के अनुसार तीर्थ यात्री नयन सरोवर में स्नान कर श्री खंड की ओर प्रस्थान करते है.... परन्तु मैं कहाँ का तीर्थ यात्री और आधी बर्फ व आधे पानी में भला कौन नहायें वो 7डिग्री तापमान में....!
                          दोस्तों यहाँ भी "इतिहास के सबसे बड़े घुमक्कड़ पांडव बंधुओं " की महिमा बिखेरी है कि इस सुंदर झील का तटबंधन भी उन्होंने ही किया,  जिससे जल एक्त्र हो सके..... चलो जिस ने भी किया हो,  पर यह स्थान बेहद मनोरम है.... मैं विशाल जी से बोला, " यदि मेरे बस में हो तो मैं इस झील की सुंदरता को देख इस का नाम नयन सरोवर से बदल "मृगनयन सरोवर " रख दूँ....!!! "      और विशाल जी बस हर बार की तरह हंस कर मेरी फिज़ूल की बातों का मन रख लेते हैं।
                          हम सबने झील के तटबंधन की दीवार पर बने माँ पार्वती के मंदिर पर माथा टेका और केवल सरोवर की ओर बढ़ गया बोतलों में पानी भरने के लिए..... क्योंकि इस स्थान के बाद श्री खंड महादेव शिला तक कहीं भी जल उपलब्ध नही है और मैं भी चल दिया केवल के पीछे-पीछे.... नयन सरोवर या नैनसर से मैने और केवल ने पंचतरणी स्नान की विधि अपनातें हुए जल के चंद छींटें अपने ऊपर फैंक लिये,  पानी भर कर सरोवर के किनारे ऊँची जगह पर बैठ गए और मैने अपने पसंदीदा बिस्कुट खोल लिये,  धीरे-धीरे कर मैने और विशाल जी ने एक-एक लीटर बर्फ सा पानी जबरदस्ती पीया....  क्योंकि अब हमे उस ऊँचाई की ओर बढ़ना था जो भी वनस्पतिहीन है,  सो शरीर में आक्सीजन की कमी को पानी में मिली हुई आक्सीजन पूरी करे.........

                                                                            .............................(क्रमश:) 
पार्वती बाग से आगे सवा पाँच बजे ही उजाला हो गया.... 

पार्वती बाग से आगे की चढ़ाई.... 

और, सोने सी पहली किरण पड़ी पर्वत शिखर पर.... 

राह में आए हसीन फूल... 

मुझे देख ऐसे इतरा रहे थे फूल,  जैसे उन्हें मालूम हो कि वे बहुत हसीन हैं.....

जितनी जिस की श्रद्धा,  उतना ही वो मगन चल रहा था..... जैसे यह नवयुवक नंगे पैर श्री खंड जा रहा था.. 

यदि आप इन पहाडों से उतर कर हमारे मैदानों में आ जाओ,  तो निश्चित ही आपके गले में पड़ा सोने का हार लूट लिया जाएगा.... 

हमारे आगे चल रहे पदयात्री..... 

पार्वती बाग से आगे..... 

वो स्थान जहाँ से बहुत बड़ी चट्टान ऊपर से नीचे गिरी.... 

हम सब तो भाग कर बच लिये,  परन्तु इस लड़के को एक छोटा सा पत्थर आ लगा.... 

ये सब पत्थर ऊपर से तो नीचे गिरे है कभी ना कभी.... भगवान बचाये इस विपदा से... 

राह में आया एक मरणासन्न ग्लेशियर... 

चढ़ जा चढ़ाईआं.......भगतां 

देखो, कितने खुश हम दोनों,  नयन सरोवर पहुँच कर.. 

नयन सरोवर पर कई यात्री जमा थे.....

नयन सरोवर के तटबंधन पर माँ पार्वती का मंदिर....

और, मैं भी केवल के पीछे-पीछे पानी भरने नयन सरोवर की ओर चल दिया.... 

नयन सरोवर के किनारे खड़ा केवल.... 

जल भरते हुए..... 

नयन सरोवर और मैं..... 

एक तीर्थ यात्री,  नयन सरोवर से सूर्य को जल देते हुए... 

इस ऊँची जगह पर हम दोनों बैठ गए,  जहाँ से नयन सरोवर का सम्पूर्ण दृश्य दिखता था.... 

नैनसर या नयन सरोवर का तटबंधन..... 

तटबंधन पर स्थापित माँ पार्वती मंदिर पर माथा टेक, यात्री रास्ते पर बढ़ "गई पर्वत " की ओर चढ़ते है.... 

मेरे प्रिय बिस्कुट,  जिन्हें मैं चार दिन से साथ ढो रहा था.... 

मैने और विशाल जी ने बिस्कुटों के साथ एक-एक लीटर बर्फ सा पानी भी जबरदस्ती पीया,  ताकि शरीर में हो रही आक्सीजन की कमी को पानी में मिली आक्सीजन पूरी करे.... 

ऐसी चार चोटियाँ हमे पार कर श्री खंड पहुँचाना था,  गई पर्वत के बाद बसार गई पर्वत पर चढ़ रहे पदयात्री.....
यदि आप चित्र को बड़ा कर देखे,  तो आप चित्र के दाये हाथ पदयात्रियों को देख सकते हैं.....